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साधु-संतों से किसी की क्या दुश्मनी हो सकती है भला? वैसे भी ये देश एक नंबर के मक्कार,दलाल, अय्याश,देह- व्यपार धंधे में लिप्त शख्स के साधु का वेश धरते ही पूजनेवाला रहा है। साधु का चोला पहनते ही सब पवित्र हो जाता है। इतना पवित्र,इतना मानवीय कि कई बार सांवैधानिक प्रावधान भी बौने नजर आने लगते हैं। लेकिन आर्ट ऑफ लिविंग के संत श्री श्री रविशंकर पर हमला जरुर चौंकानेवाला है। आजतक को दिए अपने फोनो में उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि उन पर किसने हमला किया ये पता नहीं। आजतक की ऑफिशियल साइट ने लिखा कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने उन पर हमला किया है जबकि आज बीबीसी से लेकर देश की प्रमुख साइट बता रही है कि ये श्री श्री रविशंकर पर हमला नहीं है। श्री श्री रविशंकर पूरी तरह सुरक्षित हैं और उन्‍हें किसी तरह की चोट नहीं आई है उन्हें किसी पर शक नहीं। हम देश के बाकी हमलों की तरह इस हमले की भी भर्त्सना करते हैं। हमारा ऐसा करना रुटीन का हिस्सा करार दिया जाए। लेकिन इसके आगे हम दूसरे सवाल की तरफ मुड़ना चाहेंगे।

ये देश शुरु से ही साधु-संन्यासियों का सम्मान करनेवाला देश रहा है। साधुओं के मामले में इतना लिबरल रहा है कि गलत से गलत काम किए जाने पर भी उसे बख्शता आया है। पौराणिक कथाओं में भी साधुओं ने अगर कोई गलती की तो उसकी सजा प्रशासन की ओर से न देकर उसे भगवान इसका हिसाब करेगा जैसी मान्यताओं के आधार पर छोड़ दिया गया। संभवतः इस मिली सुविधा की वजह से साधुता के खत्म होते जाने पर भी साधुओं की तादाद बढ़ती चली गयी। ऐसे हाल में भी ये विरला देश है जहां कि साधुओं के प्रति आस्था थोड़े-बहुत हिलने-डुलने के साथ भी बरकरार है। यह आमजनों की आस्था का ही नतीजा है कि साधु होना इस देश में सुरक्षा कवच के तौर पर इस्तेमाल किया गया विधान बनता चला गया। आप पत्रऔऱ कार हैं,डॉक्टर हैं,मास्टर हैं तो भी कभी भी जनता के हाथ से पिट सकते हैं लेकिन साधु होने की स्थिति में आप सुरक्षित हैं। साधुओं की ये सुरक्षा प्रशासन की ओर से शांति औऱ सुरक्षा बहाल किए जाने के दावे से कहीं आगे की चीज है क्योंकि ये पूरी तरह जनभावनाओं के बीच रहकर पाती है। शायद यही वजह है कि बाबाओं-साधुओं के आए दिन सेक्स स्कैंडल,तस्करी और दलाली जैसे काम में लिप्त होने पर लोकल स्तर के प्रशासन से लेकर केन्द्र तक की राजनीति हाथ डालने के पहले थोड़ी सकुचाती है,थर्राती है,जलजला आ जाने की धमकी से चुप मारकर बैठ जाती है। देशभर की मीडिया थोड़ी-बहुत मार खाती है और इन्हीं बाबाओं के चैनलों में शेयर खरीद लिए जैने पर चुप मारकर बैठ जाती है। ऐसे में जबकि चारों ओर से लोग बाबाओं और साधुओं पर हाथ डालने के पहले सौ बार सोचते हैं,उनके पास किसी भी बड़े नेता से ज्यादा मजबूत जनाधार होता है तो फिर उन पर कोई हमला कैसे कर सकता है?

श्री श्री रविशंकर पर जो हमला हुआ है उससे एक बात तो तत्काल साफ हो गयी है कि ये हमला उनके संत होने की वजह से नहीं हुआ है। आर्ट ऑफ लिविंग के जरिए जो शख्स लाखों लोगों के बीच अमन औऱ शांति बहाल करना चाहता है उस पर भला कोई क्यों हमला करेगा? ये देश तमाम तरह के दुगुर्णों को धारण करते हुए भी बदलाव के स्वर को पचाता आया है। आखिर इतने सारे अग्रदूतों की लाइनें ऐसे ही नहीं लग गयी है। ये हमला देश के किसी भी संत के बदलते चरित्र पर हमला है। बाबा और साधु का पदनाम धरकर जो साम्राज्य और बिजनेस का प्रसार का काम हो रहा है उस पर हमला है। दरअसल बाबाओं की लोकप्रियता का जो आधार है उसके पीछे उनका धंधा,उनसे होनेवाले मुनाफे और कमीशन जैसी सारी बातें शामिल हैं। अगर आप देश के किसी भी बड़े बाबा औऱ उनके ट्रस्ट की वर्किंग कल्चर पर गौर करें तो आपको अंदाजा लग जाएगा कि यहां भी सारे काम उसी तर्ज पर होते हैं जिस तर्ज पर देश में कोई साबुन,स्कीन क्रीम,कंडोम,गर्भनिरोधक गोली या फिर लग्जरी कार बनाने-बेचनेवाली कंपनी करती है। धर्म की आड में इन बाबाओं के बीच जबरदस्त किस्म की रायवलरी है। आपसी खींच-तान और कम्पटीशन है। हमले की जड़ यहां से पनपती है। अगर इस पूरी बात को एक लाइन में कहा जाए तो ये हमला उस संत के उपर है जिसका पदनाम संत का है लेकिन उसकी तमाम गतिविधियां कार्पोरेट,बाजार और किसी भी पूंजीपति से अलग नहीं है। ये धर्म और आस्था का रोजगार चलानेवाले एक प्रैक्टिसनर के उपर हमला है। कम से कम इस मौके पर इस देश को बख्श दीजिए कि ये देश किसी साधु-संन्यासी पर हमला करेगा।

इस देश में पैदा होनेवाला अपराधिक तत्व भी पता नहीं कौन सी घुट्टी पीकर बड़ा होता है कि अगर वो हत्या भी करता है,लूटपाट भी करता है,किसी की संपत्ति पर कब्जा भी करता है तो उसका एक हिस्सा धार्मिक कार्य में लगाता है,साधुओं को दान करता है। साधुओं और उसकी महिमा से डरता है। ये डर कमोवेश में बना ही रहता है। औऱ फिर अपराधिक ही क्यों,अपराध को रोकने में लगे लोगों के बीच भी यह भय काम करता है कि अगर उसने देश के इन साधुओं पर हाथ डाला तो उसका अनिष्ट होगा। ये बयान हमें किसी सरकारी या गैर सरकारी अधिकारियों से सुनने को नहीं मिला बल्कि इसका हवाला देश को वो बाबा जरुर जब-तब देते आए हैं जो जमीन हड़पने से लेकर हत्या करवाने के आरोप में शामिल रहे हैं। लेकिन श्री श्री रविशंकर पर हमला करनेवाले ने रत्तीभर भी नहीं सोचा कि इतने बड़े पहुंचे हुए बाबा पर हमला करने से उसे कुछ नुकसान हो जाएगा। उसके संतान अकाल मारे जाएंगे,उसके शरीर का कोई हिस्सा काम करना बंद कर देगा,उसकी आंख की रोशनी चली जाएगी। ये सारी बातें इसलिए कहना जरुरी है कि साधुओं के प्रति आस्था हमें इसी तरह भय दिखाकर पैदा की गयी है। इस पर कई तो फिल्में बनी है और कई धार्मिक सीरियलों में टुकड़ों-टुकड़ों में भी देखा है। हमला करनेवाले के भीतर से इस तरह के भय का खत्म होना दो तरह के संकेत देते हैं।

एक तो ये जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं कि ऐसे संत हम धर्म औऱ आस्था के प्रैक्टिसनर भर हैं। अगर इस देश में वाकई यशस्वी संतों की परंपरा रही है तो उससे इनका नाम जोड़ा जाना बेमानी है। लोगों को ये बात समझ आ रही है कि इन प्रैक्टिसनरों के पास अकूत सम्पत्ति है जिसे लूटा जा सकता है,धमकाकर हथिआया जा सकता है। इसके साथ ही ऐसे संत अपने साम्राज्य का विस्तार करने में जिन नीतियों का सहारा लेते हैं वो संतई और प्रवचन करने की आदि परंपरा से कही ज्यादा राजनीति,कूटनीति,मैनेजमेंट और जोड़-तोड़ के ज्यादा करीब हैं। यहीं पर आकर संत और बाकी वर्चस्वकारी,प्रभावी लोगों की स्थिति और उऩ पर होनेवाले हमले के बीच कोई फर्क नहीं रह जाता। इसलिए ये कोई आरोप नहीं है बल्कि मौजूदा दौर में बाबाओं के काम करने के तरीके पर सोचने का नजरिया भर है। ऐसे में ये बाबा और संत सिर्फ और सिर्फ नाम के स्तर पर संत औऱ साधु रह जाते हैं। भीतर-भीतर जो अंडर करन्ट प्रवाहित होता है वो पूंजीपति,राजनीतिक और इन्टरपेन्योर की स्ट्रैटजी है। ये अंडर करन्ट इस हमले से खुलकर सामने आया है। इस हमले ने एक हद तक साफ कर दिया है कि इस देश में संतई का पैटर्न पूरी तरह बदल चुका है। इसके भीतर भी जबरदस्त किस्म की प्रतिस्पर्धा है,कम्पटीशन है। मुझे ध्यान आता है कि आज से करीब आठ-नौ महीने पहले मैं सिर्फ कुछ घंटे के लिए हस्तिनापुर गया था। लेकिन बाद में वहां जो मठ और बाबागिरी का आलम देखा तो चार दिनों तक रुक गया। सिर्फ ये पता करने के लिए कि आखिर इतने मठों को बनाने के पीछे क्या मकसद है? हमें जानकर हैरानी हुई कि दिल्ली में जैसे जीटी करनाल रोड पर फार्महाउस बनाकर कमाने का जरिया बना लिया गया है,नोएडा और ओखला में फैक्ट्रियां डाल दी जाती है,वैसे ही यहां मठ डाल दिए जाते हैं। मठों के अंदर इस्तेमाल हुए शब्दों को सुनकर हैरानी हुई कि सबकुच कितना स्ट्रैटिजिकली किया जाता है। एक मठ का दूसरे मठ से जबरदस्त कम्पटीशन है। विचारधारा,धार्मिक मान्यताओं को लेकर तो बहुत पीछे की बात हो गयी। इसलिए थोड़े से भी उत्सुक हुए लोगों के लिए ये शोध का विषय है कि आखिर ऐसे संतों पर हमले होने क्यों शुरु हुए हैं? नतीजे तक पहुंचने का एक स्ट्रक्चर ये भी हो सकता है।
दूसरा ये कि ये हमला इसलिए नहीं हुआ कि श्री श्री रविशंकर ने लोगों की भावनाओं को किसी तरह से ठेस पहुंचाने का काम किया। संभव है कि ये हमला उस रुटीन के तहत किया गया जो आए दिन किसी न किसी दमदार शख्स के उपर किया जाता है। श्रद्धानत लोगों के लिए ये बात जरुर परेशान करेगी कि जिस देश में इतना बड़ा संत सुरक्षित नहीं है तो फिर उसकी क्या बिसात? लेकिन ऐसा होने से साधुओं का असर और आगे जाकर कहें तो शायद कुछ आतंक कम हो। पिछले छ महीने के भीतर देश के साधुओं/बाबाओं को लेकर आयी खबरों पर गौर करें तो कृपालु महाराज से लेकर आसाराम बापू तक,इनमें उन सेक्स स्कैंडल में फंसे साधुओं को भी शामिल कर लें तो ये साफ हो जाता है कि इन सबों को ठोस तौर पर कानूनी विधान से ही होकर गुजरना पड़ा है और अगर सबों की स्थिति बदतर होती है तो उसके पीछे कानूनी कारवायी ही होगी। अलग से कोई दैवी विधान नहीं होने जा रहा। श्री श्री रविशंकर के हमले के मामले में फिर भी इस बात की छूट मिलती है जिसे कि जरुर कोई नत्थी करके परोसेगा कि प्रभु की कृपा उन पर बनी है,लेकिन अगर घायल भक्त को शामिल कर लें तो आस्था जरुर डगमगाती है। ऐसे में आस्था की जमीन लगातार जरुर कमजोर होगी। ये बात भी है कि इस कमजोर होती जमीन का अंदाजा संतों को बेहतर तरीके से होने लगा है शायद इसलिए मैनेजमेंट और मीडिया के ऑक्सीजन से खुद को जिलाए रखने की कोशिशें तेज हुई हैं। हमले,अभी तो इन पर लेकिन कुछ दिनों पहले तांत्रिक के बयान पर कि संत आसाराम ने शिष्य ने फलां फलां के लिए मारक मंत्र इस्तेमाल करने को कहा था,कहे जाने पर तांत्रिक के आश्रम में हमले ये साफ करते हैं कि इस आस्था,धर्म और सद्भावनाओं की आढ़त चलानेवाले लोगों के बीच जो कि अपने को सांसारिकता से दूर रहने की बात करते हैं,सांसारिकता के जोड़-तोड़ जमकर चल रहे हैं। इस बात को सख्ती से प्रशासन और देश की आम जनता जितनी जल्दी समझ ले,उतना ही अच्छा है।
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17 Response to 'श्री श्री रविशंकर पर हमला किसी संत पर हमला नहीं है'
  1. Rangnath Singh
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275290542682#c6363224512866198436'> May 31, 2010 12:52 PM

    धर्म, अपराध और उनके गठजोड़ के सामाजिक मनोविज्ञान का सटीक विेश्लेषण।

     

  2. माधव
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275292153201#c5146108670214091441'> May 31, 2010 1:19 PM

    but the history of Ravishankar is stainless, then what would be the reason for the attack

     

  3. शेष
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275293171930#c8913020759297471213'> May 31, 2010 1:36 PM

    श्री श्री (हड़बोंग) रविशंकर जैसे पीछे पागल लोगों को समझ में आए तब न...। दरअसल, यह देश ही पाखंड और चोले के पीछे जीने वाला देश रहा है। यहां सोचने की प्रक्रिया को बाधित करने के लिए ही रविशंकर जैसे लोगों को सत्ता का संरक्षण मिलता रहा है।
    अब सिर्फ यह देखिए कि यह ढोंगी जीने की कला सिखा रहा है। कौन-सी कला चाहिए भई जीने के लिए...। जो लोग इतना भी नहीं समझ पा रहे हैं, वे तो पगलाएंगे ही। अब असली बात यह है कि इन पाखंडों को पालने-पोसने वाली सत्ता पर कौन ऊंगली उठाएगा। वह तो प्रगतिशीलता का चोला ओढ़े इन पाखंडियों को पालने-पोसने में लगी है...

     

  4. Shiv
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275293701790#c7976734869373845352'> May 31, 2010 1:45 PM

    शानदार लेख है.

    संतई की आड़ में साम्राज्य फैलाने का नतीजा है यह. जितने तथाकथित संत हैं, सबके खिलाफ कुछ न कुछ आरोप हैं. रायवलरी ऐसी कि कार्पोरेट्स भी शरमा जाएँ. ऐसे में कहाँ की संतई?

     

  5. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275293775511#c2533718632295632176'> May 31, 2010 1:46 PM

    कितने कथित संत हैं जिन में से किसी ने किसी सामाजिक बदलाव को दिशा दी। दहेज, और विवाहों का ग्लेमरीकरण तक तो रोका नहीं जा रहा है किसी से।

     

  6. satyanand
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275294087049#c4485282341888399964'> May 31, 2010 1:51 PM

    ye log santai nahin karte,logon ke man mein baithe tarah-tarah ke bhay aur dharm-adhyatm se judi bhavna ka vyapar karte hain. vineet, aapne bilkul sahi pariprekshya mein is ghatna ko dekha-aanka hai. badhaai!

     

  7. Suresh Chiplunkar
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275295069936#c6476543343603203281'> May 31, 2010 2:07 PM

    ए लो, कहाँ तो आपको ब्लॉगिंग करना पहाड़ लगता था, और इतनी शानदार रगड़पट्टी कब लिख लिये?

     

  8. L.Goswami
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275295139884#c7615609921345530262'> May 31, 2010 2:08 PM

    शानदार..सटीक विश्लेषण.

     

  9. Parul
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275304689227#c7248809477494608757'> May 31, 2010 4:48 PM

    ये हमला देश के किसी भी संत के बदलते चरित्र पर हमला है। बाबा और साधु का पदनाम धरकर जो साम्राज्य और बिजनेस का प्रसार का काम हो रहा है उस पर हमला है.........universal truth !

     

  10. Udan Tashtari
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275306157098#c6235865888432479320'> May 31, 2010 5:12 PM

    बहुत बेहतरीन विश्लेषण!

     

  11. व्योम
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275313044478#c4954401820627336043'> May 31, 2010 7:07 PM

    इस कोण से तो हमने सोचा ही नहीं| बढ़िया लिखा है विनीत जी|

     

  12. DR. ANWER JAMAL
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275315884047#c2859721044929343215'> May 31, 2010 7:54 PM

    फल देने वाला ईश्वर है और वह इनसान के हर कर्म का स्वयं साक्षी और गवाह है। अब जो आदमी चाहता हो कि उसे कल अच्छा फल मिले तो उसे आज मालिक की मर्ज़ी के मुताबिक़ अच्छे काम करने चाहियें। आने वाले कल में मिलने वाले फल की चिंता उसे ‘आज‘ करनी होगी। यही चिंता उसके चरित्र को निखारेगी, उसके कर्म को सुधारेगी और उसे मालिक के कोप से बचाएगी। यही दुनिया का दस्तूर है, यही मालिक का नियम है।
    ऐ ईमान वालो! परमेश्वर का डर (तक़वा) इख्तियार करो
    http://blogvani.com/blogs/blog/15882

     

  13. प्रवीण पाण्डेय
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275316517677#c2623232188706058866'> May 31, 2010 8:05 PM

    अच्छा व सच्चा विश्लेषण ।

     

  14. पलक
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275325753059#c980121306192490388'> May 31, 2010 10:39 PM

    सच ! अभी पुरुष में इतनी ताकत नहीं, जो मेरा सामना करे, किसमें है औकात ? http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_31.html मुझे याद किया सर।

     

  15. neelima sukhija arora
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275475183429#c7786018161704853109'> June 2, 2010 4:09 PM

    बेहतरीन विश्लेषण!

     

  16. statesmanil
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275593098824#c8884981027857081056'> June 4, 2010 12:54 AM

    Apake wisleshan se mai puri tarah sahamat hun aur mai ise abane blog par post bhi karane ja raha hun apaki puri credit ke sath.

     

  17. अनूप शुक्ल
    http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_31.html?showComment=1275671366060#c4983708744410733127'> June 4, 2010 10:39 PM

    बहुत सुन्दर विश्लेषण। साधु-महात्मा तो अब बड़े खतरनाक टाइप के होने लगे हैं।

     

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