.

आज से चार साल पहले इसी तरह बारिश के बाद की ठहरी हुई सी सुबह थी। घर में कोई हलचल नहीं। रसोई से न प्रेशर कूकर की आती आवाज और न बाथरुम से फुलस्पीड में बहते पानी की आवाज। न तो रेडियो सिटी पर प्रताप की आवाज और न ही दूसरे कमरे में अपने चैनल पर क्या चल रहा है,देखने की तड़प। सब शांत। मीडिया के 15-16 घंटे लगातार घिसते रहने की नौकरी छोड़ने के बाद की पहली सुबह। रात में ही तय था कि अगली सुबह नहीं जाना है लेकिन नींद उसी तरह साढ़े चार बजे खुल गयी थी। मेरे दोस्त को अपनी नाईट शिफ्ट से लौटने में अभी तीन घंटे बाकी थे और मुझे समझ नहीं आ रहा था क्या करुं? अखबारों के वेब संस्करण सरसरी तौर पर पढ़ गया था लेकिन आगे क्या...? पा नहीं क्यों अचानक से याद आया। एनडीटीवी वाले अविनाश ने कथादेश सम्मान में जैसे और लोगों को कहा था,वैसे मुझे भी कहा- कभी मोहल्ला देखिएगा। सीएसडीएस-सराय में जब मैं निजी चैनलों की भाषा पर अपना पर्चा पढ़ रहा था,उस वक्त भी राकेश कुमार सिंह(जो कि तब सराय में ही थी) ने भी कहा था-मौका मिले तो कभी ब्लॉग पर भी टहल आइए,वहां नए किस्म की भाषा बन रही है,आपको कुछ आइडिया मिलेगा। तब वो खुद हफ्तावार नाम से ब्लॉग चला रहे थे। ये सारी बातें दिमाग में चल ही रही थी और तब मैंने गूगल सर्च पर ब्लॉग टाइप किया जिसमें एक लिंक आया-क्रिएट योर ब्लॉग और फिर जैसे-जैसे निर्देश दिए थे,मैं करता गया औऱ दस मिनट के भीतर मेरा भी अपना ब्लॉग हो गया- गाहे बगाहेः हां जी सर कल्चर के खिलाफ। बाद में जब मैंने अपना डोमेन लिया तो इसे हुंकार कर दिया। दोपहर तक पांच-छः कमेंट आ गए थे और ब्लॉग बिरादरी में पहले से जमें हुए लोगों ने स्वागत किया था और लगातार लिखते रहने के लिए शुभकामनाएं दी थी। फिर तो ब्लॉग का ऐसा चस्का लगा कि ठुकदम-ठुकदम जारी ही है।

मैं शुरु से ही तकनीक और गुणा-गणित के मामले में फिसड्डी छात्र रहा हूं। आर्टस की पढ़ाई करने से काम चल गया लेकिन ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखते ही इस बात का एहसास हो गया कि हम जिस रचनात्मक तरीके से सोचते हैं,जिन रंगों,तस्वीरों और कलेवर में अपनी बात रखना चाहते हैं,उसके लिए तकनीकी समझ जरुरी है। हमारी इस कल्पना को तकनीक की भाषा में कैसे व्यक्त किया जाए,ये एक बहुत मुश्किल तो नहीं किन्तु नया काम था। न्यूज चैनल में काम करते हुए इतनी समझ तो आ गयी थी कि लिखने की शर्तें और किसी माध्यम की तकनीक संस्कृति के साथ लिखने की शर्तें दो अलग-अलग चीज है। कुछ दिन अपने मन से उटपटांग तरीके से ब्लॉगिंग करते हुए पता चलने लग गया था कौन किस बात का मास्टर है,ये सब किससे सीखा जा सकता है? हमने तब उनलोगों ो मेल करके अपनी समस्याएं साझा करना शुरु किया। चेन्नई में बैठे पीडी को तंग किया,कानपुर में अनूप शुक्ल तो सीखाने के लिए जनता दरबार ही खोल रखा था,मेल और चैट पर बात समझ नहीं आयी तो कहा अपना मोबाईल नंबर भेजो और फिर फोन पर समझाते,शैलेश भारतवासी की तो मैंने न जाने कितनी बार नींद खराब की होगी-सो रहे थे क्या,सॉरी देखिए न पिक्चर की साइज बढ़ ही नहीं रही,एक जगह जाकर फिक्स हो गई है। गिरीन्द्र आइएनएस न्यूज एजेंसी की कोल्हू के बैल जैसी थका देनेवाली नौकरी से लौटकर सुस्ता रहा होता कि हम मैसेज करते- ए हो गिरि,देखो न हमसे ऑडियो अपलोड हो ही नहीं रहा,ललित आप कविताकोश जैसा मेरा ब्लॉग भी थोड़ा सुंदर कर दीजिए न। जयपुर में बैठा कुश मेरे ब्लॉग की टेम्प्लेट मुहैया कराता। रवि रतलामी तो वर्चुअल स्पेस पर तकनीक की लंगर ही चलाते,जिसको जो फांट,सॉफ्टवेयर,एचटीएमएल कोड चाहिए,मेल करो और ले जाओ। वो लिखने के साथ-साथ अपने ब्लॉग को सजाने-संवारने का भी जमाना था। किसी ने अपने ब्लॉग पर रीडर्स मीटर लगा दी है,किसी ने स्लाइड शो लगा दिया है किसी के ब्लॉग के नीचे पीटीआइ या रेलवे स्टेशन की तरह स्क्रॉल चलते रहते और हमारा मन ललच जाता और हम पूछते-कैसे किया ऐसे और वो फिर हमें बताते और एचटीएमएल कोड भेज देते। बाद में हम समझने लग गए कि ये सब एचटीएमएल का मामला है तो सीधा मेल करते -आपके यहां जो मोंटाज है,उसका एचटीएमएल कोड भेजें। ये सब बताने-समझाने में हमें आज दिन तक कभी किसी ने मना नहीं किया बल्कि लोग इतने उत्साहित होते कि चैट के बाद खुद ही नंबर लेकर फोन पर आ जाते और न केवल मेरी तात्कालिक समस्याओं का निबटारा करते बल्कि इसके पहले क्या तरीका था,अब कैसे बदल गया और इसके एडवांस तरीके क्या हो सकते हैं,सब बताते। कई बार मैं उब जाता या बड़ा ही उलझाउ लगता तो कहता- सर/भईया/गुरुजी/दोस्त मुझे इतना समझ नहीं आता,फिलहाल आप ऐसा करें,मैं आपको अपने ब्लॉग-पासवर्ड दे देता हूं,आप उसे दुरुस्त कर दें,बाद में मैं इसे बदल लूंगा। लोग ऐसा भी कर देते,पर कुछ मना कर देते और समझाते इस तरह से पासवर्ड मत दिया करो किसी को। मैं बस इतना ही कह पाता-अरे नहीं सर,बातचीत से ही समझ आ जाता है कि ऐसा कुछ नहीं करेंगे। कंटेंट के स्तर पर लोगों के बीच चाहे जितनी भी मारकाट मची रहती हो लेकिन तकनीक बताने-समझाने और साझा करने में एक खास किस्म की आत्मीयता थी और लोग बड़े उदार तरीके से बताते।

ब्लॉगिंग करते हुए जो तकनीक हम सीख रहे थे,वो सिर्फ ब्लॉगिंग भर के काम का नहीं थी। फॉन्ट से लेकर इंटरनेट और कम्प्यूटर की ऐसी सारी चीजें थी जो कि अभी बेहतर तरीके से काम आ रही है। एक तरह से कहें तो हम निट या एरिना जैसे प्रोफेशनल कम्प्यूटर ट्रेनिंग सेंटर में गए बिना वो सबकुछ सीख रहे थे जिसकी हमें जरुरत थी। हम इस तकनीक को बहुत ही घरेलू स्तर पर सीख रहे थे। जब हम चैट या फोन पर बात कर रहे होते तो ये भी बताते-पता है सर,आज रात में मेरे हॉस्टल की मेस बंद है तो मैं बाहर रहूंगा,आपसे देर रात ही फिर बात हो पाएगी। अरे दोस्त,मुझे ऑफिस के लिए निकलना है,वापस आकर कॉल करुं? मैं पूछ लेता-ब्रेकफास्ट किया कि नहीं। देखो इतनी सारी बातें हो गयी लेकिन याद ही नहीं रहा कि बेटी को स्कूल से लाने जाना है। तकनीक औऱ समस्याओं पर बात करते हुए भी देशभर में फैले ब्लॉगरों की गृहस्थी और हलचलों से होकर गुजरते। बाद की बातचीत तो इतनी अनौपचारिक हो गयी कि पटना में बैठा ब्लॉगर बताता कि आज हमने मुनगे की सब्जी खायी,मजा आ गया,धनबाद की लवली बहुत दिनों से गायब क्यों है,शायद बीमार होगी? तकनीकी मदद करने के अलावे फिर कंटेंट के स्तर पर भी बातचीत होने लगी। लोग कमेंट तो करते या मांगते ही लेकिन जी नहीं भरने की स्थिति में फोन तक करते और कहते-चैट पर कमेंट के लिए कहा था,तीन घंटे हो गए,तुमने कुछ किया ही नहीं या फिर-फोन बस ये कहने के लिए किया था कि सही पोस्ट लिखी है तुमने,दीयाबरनी वाली बात पढ़कर तो हम सेंटी हो गए। हम वर्चुअल स्पेस की एक अनंत दुनिया के बीच ही उसी तरह के घरेलू संबंधों से भावनात्मक स्तर पर बंधने लगे थे जैसे कि परिवार के सदस्यों से बंधे होते हैं। मार्शल मैक्लूहान ने जिस ग्लोबल विलेज की बात कही थी,औद्योगिक स्तर पर नहीं किन्तु तकनीकी और भावनात्मक स्तर पर ज्यादा बेहतर समझ आने लगा था। तीन-चार दिनों तक किसी ने पोस्ट नहीं लिखी तो चिंता होने लगती,क्या हो गया मनीषा पांडे को,कहीं बीमार तो नहीं हो गई? अरे युनुस खान ने तो रेडियोनामा को गांव का ट्रांसफार्मर ही बना दिया है,तीन दिन हो गए,कोई अपडेट ही नहीं है। तब ब्लॉगरों को लेकर कई किस्म के मिथक भी अपने आप बन गए थे,मसलन-ब्लॉगर वह है जो चौबीसों घंटे ऑनलाइन रहता है,जिसे कभी नींद नहीं आती है,जो कभी खाता भी है तो अपनी डेस्क या स्टडी टेबल पर ही। ब्लॉगर कभी बीमार नहीं पड़ता है,वो अजर-अमर है और जब तक ब्लॉगिंग करता रहेगा,यमराज को भी हिम्मत नहीं है कि उसे उठा ले जाए। ये एक किस्म से चौबीस घंटे की नौकरी में जीने जैसी संस्कृति थी जिसे कि किसी ने किसी पर थोपा नहीं था बल्कि लोगों ने अपनी खुद की इच्छा,दिलचस्पी और चस्के की गिरफ्त में आकर पैदा की थी।
आगे भी जारी.....

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19 Response to 'आज ब्लॉगिंग करते हुए चार साल,याद आते हैं पुराने दिन(1)'
  1. Brajmohan Kumar
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316240622123#c1524039606315509787'> September 17, 2011 11:53 AM

    विनीत जी,
    अब ये ब्लॉग पढकर हम सेंटी हो गए, या यूँ कहिये कि हम भी अतीत में चले गए। ब्लॉग ने कई अच्छे दोस्त दिए हैं। ऐसे दोस्त, जिनसे दिल खोल के बातें होती हैं। और शुरू-शुरू तो हम भी ऐसे ही करते थे, कुछ भी लिखा तो सबको फोन, एस एम एस करके या मेल या चैट पर बताते थे।
    और आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि "ये एक किस्म से चौबीस घंटे की नौकरी में जीने जैसी संस्कृति थी जिसे कि किसी ने किसी पर थोपा नहीं था बल्कि लोगों ने अपनी खुद की इच्छा, दिलचस्पी और चस्के की गिरफ्त में आकर पैदा की थी"।

     

  2. प्रवीण पाण्डेय
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316242347689#c3455629565494343277'> September 17, 2011 12:22 PM

    रोचक लगी आपकी आपबीती, बहुत कुछ सीखने को मिला यहाँ पर।

     

  3. PD
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316248381315#c8633495085043199353'> September 17, 2011 2:03 PM

    आज मुझे भी अपने बीते पांच साला याद आ रहे हैं.. ३० नवंबर को शुरू किया था लिखना..

    बहुत याद करने कि कोशिश की विनीत, मगर याद नहीं आ रहा है कि मैंने कभी कोई उल्लेखनीय मदद की हो तुम्हारी.. मुझे यह तुम्हारा प्यार ही नजर आता है..

    अगले भाग का इन्तजार कर रहा हूँ.. :)

     

  4. shikha varshney
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316249017147#c7892358005611814226'> September 17, 2011 2:13 PM

    जय ब्लोगिंग ,जय ब्लॉगर ..
    अच्छी लगी आपकी यादें.

     

  5. Rangnath Singh
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316250539235#c3262534617214791827'> September 17, 2011 2:38 PM

    आप ब्लॉग स्वर्ण/हीरक जयंती मनाएं इसी शुभकामना के साथ....

     

  6. neelima sukhija arora
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316250991863#c5416216819652158037'> September 17, 2011 2:46 PM

    विनीत आप तो वाकई इमोशनल कर दिए। हम भी तकरीबन चार साल पहले ही ब्लागिंग शुरू किए थे। तब से ऐसे ही सब मित्रों की मदद से ब्लागिगं करते आए हैं। वाकई नोस्टलजिक कर दिए, ब्लागिंग के शुरुआती दिन याद दिला कर।

     

  7. निवेदिता
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316252464247#c8702200757716987726'> September 17, 2011 3:11 PM

    रोचक लगा आपका संस्मरण .......आभार !

     

  8. Arvind Mishra
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316259400096#c7215244814460869982'> September 17, 2011 5:06 PM

    चलिए दो तीन ही नाम याद आये तो सही ,मैं भी उनमें किसी को ढूंढ रहा , अगर आपको मिले तो जरुर बताईएगा ....ईश्वर करें सब स्वस्थ सानंद हों -आपको शुभकामनाएं ...लम्बा लिखते हैं आप ...यह शैली ब्लॉग में ठीक भी है या नहीं पंचों के ऊपर छोड़ रहा हूँ -मगर लिखते आप लाजवाब हैं पूरा प्रवाहमय जैसे कोई नदी अपने उद्गम से कल कल करती बह चली हो ....

     

  9. rashmi ravija
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316263283473#c3234507295194825098'> September 17, 2011 6:11 PM

    हमने भी आपकी दियाबरनी वाली पोस्ट ही पढ़ी थी सबसे पहले...

    ये तो है...ब्लॉग्गिंग में असहमति अपनी जगह पर मदद के लिए सब तैयार रहते हैं..

     

  10. सतीश पंचम
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316267359307#c3460328976111084134'> September 17, 2011 7:19 PM

    रोचक संस्मरण!

     

  11. जाट देवता (संदीप पवाँर)
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316270531131#c8507972284889107182'> September 17, 2011 8:12 PM

    ऐसे ही लगे रहो।

     

  12. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316280583721#c8010015663689734706'> September 17, 2011 10:59 PM

    यादें तो यादें हैं .........बस रह जाती हैं !
    बधाई चौके की !

     

  13. raviratlami
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316325116997#c8111761755539723558'> September 18, 2011 11:21 AM

    बधाई.

    वैसे, हिंदी ब्लॉगिंग को नई दिशा और धार देने में तीन नाम प्रमुख हैं -
    मोहल्ला
    भड़ास और,
    गाहे बगाहे (हुंकार)

     

  14. अनूप शुक्ल
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316486820004#c6812240915347897508'> September 20, 2011 8:17 AM

    वाह बधाई हो!


    मुझको इलाहाबाद में ब्लागर सम्मेलन के मौके पर हुई मुलाकात की याद है। कैसे एकदम तल्लीन होकर रपट तैयार करते हो! और भी तमाम बातें।

    तुम्हारी सबसे अच्छी पोस्टें मुझे वे लगीं जो तुमने अपने साथ जुड़े लोगों के बारे में लिखीं। अद्भुत हैं वे।

    चार साल पूरे होने की बधाई और आगे के लेखन के लिये शुभकामनायें।

    अगले भाग का इंतजार कर रहे हैं भाई! :)

     

  15. Puja Upadhyay
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316512116967#c3438006558205191656'> September 20, 2011 3:18 PM

    रोचक रही आपकी आपबीती...
    जब इतने लोगों को परेशान करके ब्लॉग का कलेवर बनाया है तो हमारी भी एक सलाह पर अमल कर लीजिए...ब्लॉग में एक 'आर्काइव' रहना जरूरी है...इससे पिछली पोस्ट पर जाना आसान रहता है पाठकों के लिए.
    उम्मीद है आप जल्दी ही आर्काइव लगा देंगे...ब्लॉग के और बहुत से सालों के लिए शुभकामनाएं.

     

  16. Sanjeet Tripathi
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316518206347#c7173135234283599169'> September 20, 2011 5:00 PM

    बधाई विनीत बाबू…
    अच्छा लगा पुराने दिनों को पढ़कर, एक बात तो है, ब्लॉगिंग की दुनिया में जानकार कभी मदद करने से मना नहीं करते।

    चलिए अगली किश्त का इंतजार करते हैं।
    फिर से बधाई और शुभकामनाएं

     

  17. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1316802262833#c5062642355722971230'> September 23, 2011 11:54 PM

    ब्लाग के पांचवे वर्ष के पदार्पण पर बधाई॥

     

  18. संतोष त्रिवेदी
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1317050172767#c8965111433300840445'> September 26, 2011 8:46 PM

    किसी नये ब्लॉगर के लिए बड़ी प्रेरणादायक पोस्ट.....आप जैसी ही शुरुआत अपन की भी रही.प्रवीण त्रिवेदी ने शुरू में काफ़ी सपोर्ट किया.बाद में ई पंडित और प्रवीण पाण्डेयजी से भी प्रेरणा मिली .अविनाश वाचस्पति ,डॉ.अरविन्द मिश्र और अनूप शुक्लजी नए ब्लॉगर के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं !कुछ पूछ-पाछ कर ,कुछ जुगत लगाकर हम भी शुरू हो गए हैं ! आपके अनुभव बहुतों के काम आयेंगे !
    आपका आभार !

     

  19. Mukta Dutt
    http://www.hunkaar.com/2011/09/1.html?showComment=1319389279810#c2762002204708216904'> October 23, 2011 10:31 PM

    आपका यह पोस्ट नए ब्लॉगर्स के लिए बहुत ही प्रेरक है। भविष्य में भी बेहतरीन लेखन के लिए शुभकामनाँए।

     

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