.

आदि, तू इतना अपसेट क्यों हो रहा है यार ? एक संडे हमलोग नहीं मिलते तो इससे पहाड़ तो नहीं टूट जाता न और फिर आगे हम इतने संडे साथ होंगे कि तुझे याद भी नहीं रहेगा कि कभी एक संडे हमने मिस्स भी किया था. जस्टू कूल डूड.

सद्या,मैं सीरियस हूं और तूझे मजाक सूझ रहा है. इस तरह से बिल्कुल भी नहीं चलेगा.तुम्हें अपनी प्रायरिटी मेरे सामने क्लीयर करनी ही होगी.

तो किस तरह से चलेगा जानेमन. आ जा कमलानगर तू भी. मिलाती हूं तुझको तेरी होनेवाली सासू मां से, आज तू भी डेट कर लियो मेरी तरह. बोल आ रहा है, भेजूं तेरे लिए घोड़ी ?

सद्या, प्लीज बंद करो बकवास नहीं तो फिर अपनी पेशेंस खत्म हो गई तो तुझे सारे लड़के एक से होते हैं के अलावे बोलने के लिए कुछ नहीं बचेगा. तुझे एक जरा भी इस बात की फीलिंग होती कि मैंने डबल शिफ्ट सिर्फ इसलिए की थी कि संडे की शाम तुम्हारे साथ बिता सकूं तो अभी इस तरह लापरवाही से मेरे से बात नहीं कर रही होती. कितना मुश्किल है इस चैनल की नौकरी से एक संडे निकालना, तुम्हें कुछ नहीं मालूम यार. तेरा क्या है, घर से निकलो मटरगश्ती करो और वापस घर.

हैलो डीयर,मैं कोई मस्ती-बस्ती नहीं करती, जीआरई की तैयारी कर रही हूं और जरा करके दिखइयो तो तू. दो घंटे कायदे से बैठा नहीं जाता और चला है हमें ही ताने दे..क्या करता है तू चैनल में, हमें पता नहीं है क्या ? आज दिखाएंगे रात के सात बजे- हिन्दुस्तान का आखिरी मुगल बादशाह अभी भी है जिंदा. आखिर क्यों दीपिका पादुकोण ने पार्टी में जाने से इन्कार. ही ही ही, यही है तेरा मीडिया और यही है तेरी जर्नलिज्म. इसी के लिए तू डबल शिफ्ट करता है, पहाड़ तोड़ता है नोएडा में बैठकर.

सद्या. तुम मेरे काम का इस तरह मजाक उड़ाओगी, डिस्गस्टिंग. यार, इतना घटिया तरीके से तो मेरे दुश्मन भी नहीं लेते मेरे काम को. इसका मतलब है तू मेरे पीठ पीछे इसी तरह से मजे लेती होगी दोस्तों के बीच मेरा.

लग गई न मिर्ची आदि, जरा सा मैंने कह दिया तो और तू पिछले दस मिनट से जो फोन पर बकवास किए जा रहा है वो क्या है ? मेरी मां नहीं बुढ़िया है, सत्तर की दशक की खटारा. बोल, यही बात तू अपनी मॉम के लिए बोल सकता है. मैं बोलूं, तेरी मां किसी एंगिल से मां नहीं लगती, चुड़ैल लगती है मुझे और मैं तो उनके साये से भी डरती हूं. मैंने तो तेरे से शादी के लिए बस इसलिए हां कर दी कि तूने ही कमिट किया है कि हम साथ नहीं रहेंगे. नहीं तो, सास..हूं, दो घंटे में चक्कर खाने लगूं मैं उनके सामने.

सद्या, मैं तेरा खून पी जाउंगा. मेको जो बोलना है बोल पर मेरी मां पर मत जा..ये  जो तू मॉड बन रही है न, सब दो मिनट में भीतर चला जाएगा. बता तो जरा इससे पहले कितनी बार तूने मदर्स डे सिलेब्रेट किया है और कितनी बार मां के साथ बिताए हैं ?

कभी नहीं बिताए हैं तो क्या अब भी नहीं बिताउं और फिर तू होता कौन है यार ये बतानेवाला कि मैं क्या सिलेब्रेट करुं क्या नहीं..और दुनिया में क्या सिर्फ एक ही दिन है सिलेब्रेट करने के..वो तेरी सड़ी सी तीन दिन के बासी गुलाब और क्रेडी नूडल्स में लंगर खाकर मेकआउट करने के. कभी दूसरे दिन का भी ख्याल कर, जिंदगी बहुत बड़ी लगेगी. आज पहली बार अफसोस हो रहा है आदि रियली, विलीव मी कि तू मेरा प्यार है..ssssss

सद्या,सद्या..प्लीज.यार तेरी यही बात मुझे बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती. पहले तो अटैकिंग होती हो और जब मैं पलटकर जवाब देने लगता हूं तो एमसीडी के नल बहाने लग जाती हो. अच्छा लग रहा होगा तू कमलानगर की भीड़ में इस तरह रोकर फोन पर बात कर रही होगी. कमऑन..चुप्प हो जाओ, अब तेरी मां सत्तर की दशक की खटारा है तो क्या श्वेता तिवारी कहूं उन्हें. खैर, जाने दे, तेरी मां को भला-बुरा कहने का मतलब है अपनी ही सासू मां की बेइज्जती करना, लीव इट.

वट एक बात तो है, तू मना तो कर सकती थी न कि आज रहने दो मां, कल चलेंगे कमलानगर, वैसे भी आज भीड़ बहुत होगी ? मेरे लिए तो तूने पहले भी पचासों बहाने बनाए हैं, पहली बार तो होता नहीं.

नहीं बना सकती थी आदि क्योंकि मां ने नहीं कहा था कि मुझे तेरे साथ आज घूमना है. मैं भागकर आयी थी तेरे से मिलने के चक्कर में पार्लर वैक्स कराने. आकर देखा तो कमलानगर का नजारा ही अलग था. आज लड़कियां रोज की तरह ही अदा में थी, उसी तरह से वाउ,कमऑन,मिसिंग यू, कर रही थी लेकिन उनके हाथ किसी दूसरे खुरदरे,कठोर हाथों में नहीं अपनी मां के हाथों में थे. वो उनके साथ मोमोज खा रही थी, एक ही तरह की स्लीपर खरीद रहीं थी, पिक्स लेकर ट्वीट कर रही थी और तो और जबरदस्ती मॉम के लिए एक-दो सेंटी लड़की बिकनी खरीद रही थी. मुझे ये सब बहुत ही फैसिनेटिंग लगा. मैं भूल गई की वैक्स करानी है और फिर जब हमें मिलना ही नहीं था तेरे से तो फिर वैक्स तो बाद में भी करा सकते थे..सो वापस घर आ गयी. मां तो तैयार कराया और आ गयी कमलानगर.

अच्छा, तो तुने जान-बूझकर मिलने का प्रोग्राम कैंसिल किया..तू सच में कितनी कमीनी है सद्या.यार इतना घटिया तरीके से तू ये सब बता भी रही है.तुझे मेरा एक जरा भी ध्यान नहीं आया कि आदि कैसे रातभर की शिफ्ट करके आया होगा, अभी सो रहा होगा और मेरे लिए शाम को आएगा..कुछ भी नहीं सद्या, एक बार भी नहीं.तूने सच में अपनी औकात दिखा दी..तू सच में चालू चीज निकली यार. मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि तू इस तरह भी कर सकती है. मां की एनीवर्सरी औऱ बर्थ डे तक छोड़ा है तूने मेरे लिए और आज इस बाजार की ड्रामेबाजी मर्दस डे के लिए मेरी एक वीक पहले मिलने के प्लान को मिट्टी में मिला दिया.

आदि, मैंने मां से पचासों बार तेरे लिए झूठ बोले हैं लेकिन आज नहीं बोल सकती थी और आज क्या कभी नहीं बोलूंगी और पता है पहली बार सच क्या बोलूंगी- मां, तुम्हारी बेटी ने एक लड़के से प्यार किया था जिसने मिलने से पहले ही तुझे बहुत इन्सल्ट किया, तुझे खटारा कहा लेकिन वो अब इतिहास का हिस्सा है, मेरा पहला प्यार तुम ही हो मां. अब फोन रख दे आदि और हां पिछले डेढ़ घंटे से तूने जो व्हॉट्स अप पर जीना हराम कर दिया है न, बंद कर दे.नहीं तो ब्लॉक कर दूंगी.
......................................
क्या हुआ बेटे, कहां चली गयी थी तू ? वेटर कितनी बार आकर लौट गया, पूछ रहा था कौन सा पिज्जा चाहिए आपको, पानी नार्मल लेंगी या मिनरल, मैं तो तेरा इंतजार कर रही थी, समझ नहीं आ रहा था.
कुछ नहीं मां, बस...वो क्या है न कि मेरी एक फ्रैंड है, आज कहा था कि हम मदर्स डे पर ओल्ड एज होम जाएंगे, मैं इधर आ गयी तो वो नाराज हो गयी और कोई बात नहीं.
पगली तो तूने इत्ती सी बात पर अपनी आइलाइनर खराब कर ली रो-रोकर. खैर जाने दे..आर्डर कर फटाफट. अब तो पिज्जा मंगा या पापड़, मुझे तो भूख लगी है जोर से.
एक्सक्यूज मी भइया.
जी मैम.
एक मैक्सिकनन ग्रीन वेव मीडियम और एक डबल चीज मार्केरिटा स्मॉल देना. साथ में दो कोक.
जी.
और बताओ मॉम, कैसी लग रही है मेरे साथ डेटिंग.
अच्छा तो यहां आकर तेरी खटारा मां, मॉम हो गई.
मां, तुम भी न..सारा मजा खराब कर देती हो, तुम तो मुझसे भी ज्यादा स्पायसी लगती हो.
चलो छोड़ो, आज पापा से ही पूछ लूंगी.
 सद्या ने आंख मारकर हल्के से मां के पैर दबा दिए थे..
एक बात बोलूं बेटा..तुझे आज न मेरे साथ नहीं आना चाहिए था, किसी और दिन
क्यों ओल्डएज होम तो कल भी जा सकती हूं न मॉम.
जा तो सकती है लेकिन पता नहीं कल तेरी दोस्त को छुट्टी मिले न मिले.
अरे वो रोज बैली बैठी होती है, मिल जाएगी छुट्टी.
सद्या, बैठा होता है, होती नहीं है............................
मॉम....
मैम,ये रहे आपके आर्डर.
नहीं, पहले मैं खिलाउंगी, आपने तो खिलाकर इतना बड़ा कर ही दिया, आज मैं.
नहीं सद्या मैं,
नहीं मॉम मैं.
एक्सक्यूज मी मैम, क्या हमलोग आपकी ये वीडियो शूट कर सकते हैं. हमारे यहां ऑफर है कि जितने बच्चे अपनी मॉम के साथ आएंगे, उनकी वीडियो बनाकर कॉन्टेस्ट में शामिल करेंगे और जिस वीडियो को सबसे ज्यादा हिट्स मिलेंगे, उन्हें लाइफ टाइम हमारे यहां का पिज्जा फ्री.
क्या भइया, पहले मुझे मॉम को एक-दो टुकड़े खिला तो लेने देते, बीच में ही टोक दिया.
ओह मॉम, इतनी सारी चीजों की टॉपिंग तो पहले से की हुई है, आपने आंसू की टॉपिंग क्यों कर दी..बचा कर रखो मॉम, अभी से ही..अभी तो बाबुल की दुआएं लेती जा की सीडी बजनी बाकी है..
...........................................


| | edit post

सहारा श्री से बड़ा देशभक्ति का गवैया इस देश में कोई दूसरा है ? वो बंदा न सिर्फ जन-गण-मन गीत को आत्मा से गाता है बल्कि अपने लाखों कर्मचारियों को गाने के लिए उकसाता( प्रेरित न पढ़ें प्लीज) है. इसकी चर्चा न केवल मीडिया में जमकर होती है बल्कि दर्जनों चैनल के मीडियाकर्मी लखनउ सहाराश्री की इस संबंध में बाइट लेने लखनउ उड़ाए/दौड़ाए जाते हैं, द हिन्दू से लेकर तमाम दूसरे अखबार इस ऐतिहासिक घटना की पूर्ण संध्या पर आधे पन्ने का विज्ञापन छापते हैं. फिर भी है कि आप एक सांसद के वन्दे मातरम् गाए जाने के दौरान उठकर बाहर चले जाने को मुद्दा बनाए दे रहे हैं.

आपलोग वन्दे मातरम् को लेकर जो चर्चा कर रहे हैं और उसमें सहाराश्री( जन-गण-मन के कारण) को किसी भी तरह से शामिल नहीं कर रहे हैं तो एक तरह से गाय पर लेख लिख रहे हैं जिसमे सारी बातें तो बता रहे हैं लेकिन ये लिख ही नहीं रहे हैं कि देशभर में गौमाता सुरक्षित रहे इसके लिए विश्व हिन्दू परिषद् के लोग अथक प्रयास करते रहते हैं. देखिएजी, वैचारिक असहमति अलग जगह पर है लेकिन जो काम जो कर रहे हों, उसकी फुल्ल क्रेडिट देनी चाहिए, इससे अपनी ही आत्मा का विस्तार होता है.


अब कल को ये कहा जाए कि इस देश में लोकसभा/राज्यसभा के अध्यक्ष ज्यादा सम्मानित हैं या सहाराश्री तो स्वाभाविक है कि जवाब में सहाराश्री पर टिक मारा जाएगा क्योंकि ये अकेला बंदा जो लाखों से एक साथ जन-गण-मण और जरुरत पड़े तो वन्दे मातरम् गवा सकता है वो काम अध्यक्ष नहीं कर पाए.कहां से होगा लोकतंत्र बहाल और कैसे होगी राष्ट्रभक्ति ? अब ये मत कर्मचारियों से पूछने लगिएगा कि आपको इस गाने की एवज में कोई और गाने को कहा जाए तो क्या गाएंगे ?


अगर वन्दे मातरम् गाने से ही देशभक्त होना तय है तो यकीन मानिए सहारा श्री, जिंदल, अंबानी, पीवीआर,फन सिनेमा के आगे आपलोग कद्दू हैं. आप खुद भी खखारकर गा लें सो बहुत हैं, ये तो पूरी की पूरी लॉट को एकमुश्त देशभक्त बनाते हैं जी ? जान लीजिए,देशभक्ति इस देश में भाववाचक नहीं जातिवाचक संज्ञा है. जहां अपने मन से भाववाचक के जरिए व्यक्तिवाचक बनने की कोशिश की जिएगा, खट से देशद्रोही करार दे दिए जाइएगा. संविधान और लोकतंत्र का ठेका अब कार्पोरेट के हाथों में है. आउटसोर्सिंग काल में सरकार की भूमिका आउटसोर्सिंग करवाने भर की है. कार्पोरेट इन भावनाओं की भाववाचक संज्ञा में आउटसोर्सिंग करके यानी कच्चे माल को अंतिम उत्पाद की शक्ल में जातिवाचक के रुप में समाज के बीच पेश करती है. भावनाएं जितनी तेजी से जातिवाचक संज्ञा में तब्दील होगी, सरकार और कार्पोरेट के लिए उतना ही आराम होगा और बाकी दिक्कत होने पर स्वयं जनता इस रुप में सक्रिय हो जाएगी कि वो व्यक्तिवाचक बननेवाले को घसीट-घसीटकर अपने पाले में लाएगी. विज्ञापन का शास्त्र बताता है कि उपभोक्ता को इस हालत में कर दो कि वो खुद उत्पादक की रक्षा के लिए मर मिटे और उसके पक्ष में काम करने लग जाए.

| | edit post

इसलिए बरखा दत्त, बरखा दत्त है

Posted On 10:31 PM by विनीत कुमार | 2 comments


टाइम्स नाउ औऱ सीएनएन-आइबीएन जैसे चैनलों को चाहिए कि वो स्क्रीन पर BOSS ON COMIC RELIEF का स्थायी स्लग चिपका दे ताकि हम यकीन कर सकें कि पाकिस्तान के चुनाव की खबर दिखाए जाने के बजाय जो तालमखनी चैनल बना रहे हैं, उसकी वजह अर्णव औऱ राजदीप के वीकएंड बनाने के कारण है. नहीं तो इन चैनलों के लिए पाकिस्तान में चुनाव के आनेवाले नतीजे और नवाज शरीफ की सरकार बनने की संभावना से बड़ी खबर क्या हो सकती थी ?

इधर यही काम एबीपी,आजतक,आइबीएन7 और इंडिया न्यूज जैसे चैनलों को करना चाहिए- साहब छुट्टी पर हैं लिहाजा "ललित निंबध" से काम चलाइए. जी न्यूज को तो लगता है कायदे से दो-चार चपत लगाएं, कंटेंट के नाम पर कुछ है नहीं लेकिन कार्यक्रम का नाम दिया है- WE HATE DEMOCRACY. ये बात पाकिस्तान के लोग कह रहे हैं. इधर न्यूज24 हमेशा की तरह टीबी नॉट टीवी का शिकार है,वही अनसुनी कहानियां जारी है. आजतक के पास कहने को कुछ है नहीं तो बिना खबर के विस्तार में गए पैनल डिस्कशन शुरु.

अगर आप ये बात गंभीरता से समझना चाहते हैं कि अगर न्यूज चैनल के बॉस वीकएंड या छुट्टी पर होते हैं और दूसरी तरह टीवी क्र्यू जहां की खबर हो वहां भेजने की हैसियत चैनल के पास नहीं होती है तो किस तरह का कचरा स्क्रीन पर फैलाकर राष्ट्रीय खबर बनायी जाती है, तो अभी से लेकर आनेवाले एक-दो घंटे तक न्यूज चैनल जरुर देखिए. आइबीएन-7 के लिए सबसे बड़ी खबर एक तेंदुआ के घुस आने की है और इंडिया न्यूज ने बैंग्लोर के स्वामी की सोने की लंका और अभिषेक-एश्वर्या की शादी के पुरोहित होने के नाम पर अमिताभ बच्चन को घसीटने की जो कोशिश की, क्या बॉस छुट्टी पर नहीं होते तो आज ही ये खबर ब्रेक होती ? औऱ इन सबके बीच इंडिया टीवी के बॉस जो सप्ताह में एक ही दिन दिखाई देते हैं, हमेशा की तरह वर्चुअल अदालत में खी-खी,खी-खी में लगे हैं.

फील्ड की घटती रिपोर्टिंग और कंटेंट के न होने की स्थिति तो चैनल कितनी बेहूदगी के साथ छिपाने का काम करता है, आज रात की प्राइम टाइम में खुलकर देखने को मिला और हम और आप हैं कि वेवजह हलकान हुए जाते हैं. यही काम अगर सरबजीत या फिर क्रिकेट हारने जैसे हायपर इमोशनल मामले को लेकर होता तो चैनल के सारे आका घर की पनीर पसंदा और सांगरिला की वाइन छोड़कर स्क्रीन पर आ जाते लेकिन पाकिस्तान में चुनाव और सरकार बनने की घटना पर जहां हैं, वहीं पड़े हैं. इस पर आप सबों को गंभीरता से नजर रखनी चाहिए कि कैसे कोई खबर बिना ज्यादा मेहनत और लागत न लगाए जाने की स्थिति में राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है और जिसे सच में खबर का हिस्सा होना चाहिए, उसकी कोई चर्चा नहीं होती.

ऐसे ही गिने-चुने मौके पर तमाम आलोचना,असहमति,शक और क्रिटिकल होने के बीच बरखा दत्त,बरखा दत्त लगती है. पिछले एक घंटे से टीवी स्क्रीन पर जो भसड़ देखी, उसके बीच बरखा दत्त की लाहौर से लाइव रिपोर्टिंग और दिनभर की रिपोर्टिंग की फीचर गहन विश्लेषण और चुस्त स्क्रीप्टिंग का बेहतर नमूना है. हम बरखा दत्त की दूसरी वजहों से आगे भी आलोचना करते रहेंगे लेकिन मीडिया में प्रोफेशनलिज्म अगर बचा है तो वो बरखा जैसे चंद लोगों के होने की वजह से ही है.
| | edit post
आप इस बात पर इथने नाराज क्यों हो रहे हैं कि स्टूडियो में दो जर्नलिस्ट एसी में बैठकर बात कर रहा है ? अच्छा है न कि आप राजनीतिक लोग खुले में, 46 डिग्री तापमान में प्रेस कांन्फ्रेंस कर रहे हैं और हम एसी में. इसमें इतनी तूल देने की क्या जरुरत है ? अर्णव ने कर्नाटक के नतीज को लेकर चल रही बहस में राजीव प्रताप रुढ़ी को बहुत ही हल्के अंदाज में कहा और उसके बाद माहौल इतना हल्का हो गया कि आउटलुक के पूर्व संपादक विनोद मेहता ने कहा- अरे पहले राजीव को एक गिलास पानी तो भिजवाओ, देखो एसी के बाहर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहा है ? फिर टाइम्स नाउ की स्टूडिया में ठहाका गूंज गया जिसमें गाढ़ी मुस्कान लार्ड मेघनाथ देसाई की भी थी.

एसी में जर्नलिस्ट के होने को राजीव प्रताप रुढ़ी ने इतना अधिक तूल दिया कि वो कोई गंभीर मसला होने के बजाय प्रहसन का हिस्सा बन गया और बारी-बारी से लोग मजे लेने लग गए. मैंने आज सुबह पहली बार अर्णव गोस्वामी को इतना खुलकर हंसते देखा. नहीं तो वो न्यूजरुम को एक गंभीर अदालत( रजत शर्मा से अलग और सचमुच गंभीर) बनाने के अलावे कोई दूसरा परिवेश नहीं बनाते और वो अदालत भी ऐसी कि देखते हुए लगे कि ये भारतीय संवैधानिक प्रावधानों के तहत निर्मित अदालत नहीं बल्कि ठाकुरजी के आगे की कोठरी है जहां से वेद,उपनिषद् हटाकर पैनल डिस्कशन कराए जा रहे हैं जबकि अंदर बैठकर ठाकुरजी सब देख रहे हैं. अर्णव उनके अनुचर हैं और जहां किसी ने धर्म के विरुद्ध रवैया अपनाया नहीं कि अर्णव का कोडा हाजिर. इस तरह से अर्णव की अदालत में राज व्यवस्था दैवी सिद्धांत के तहत चलती है जिसमे हिन्दू हर हाल में देवपुत्र हैं. खैर

अर्णव के लगातार मुस्कराने और बाकी के पैनल के लोगों के बारी-बारी से मजे लिए जाने जिनमे कि टाइम्स नाउ की नविका कुमार भी शामिल रहीं, जिनका नीरा राडिया औऱ 2जी स्पेक्ट्रम मामले में खासा नाम चर्चा में रहा, राजीव प्रताप रुढ़ी खुद भी मुस्कराने लग गए और बात आयी-गयी हो गयी. यकीन मानिए राजीव और अर्णव मेरी घोर वैचारिक असहमति होने के बावजूद बहुत ही क्यूट लग रहे थे. लेकिन इस क्यूट लगने और मजे लेने के बीच जर्नलिस्टों के एसी में रहने की बात को राजीव प्रतप रुढ़ी जिस तरह उठाना चाह रहे थे और दर्शकों को ये बताना चाह रहे थे कि आप जिन्हें लोकतंत्र का चौथा खंभा मान रहे हैं वो घोर आरामदेह स्थिति में जीनेवाला तबका है, धरी की धरी ही रह गयी. अर्णव सहित पैनल के बाकी लोगों के हुलेलुलु कर दिए जाने के बाद इस पर आगे बात बढ़ ही नहीं पायी. लेकिन

ये तो टाइम्स नाउ की एक बानगी है. हिन्दी के सेमिनारों में ये मुहावरा इतना घिस चुका है कि बोलनेवाले को पता नहीं एम्बरेसिंग लगती भी है न नहीं, लेकिन हमारे कान अपने आप सुनने के पहले कुनमुनाने लगते हैं. फिर वही एसी वाली बात. एसी मे रहने को एक लेखक के सबसे अधिक विलासी और सुविधाभोगी होने के प्रतीक के तौर पर जमाने से जो स्थापित कर दिया गया है सो कर दिया गया है. ये अलग बात है कि अगर आप फेहरिस्त बनाने बैठें तो कई ऐसे हिन्दी लेखक मिल जाएंगे जो एसी तो छोडिए, कूलर तक की हवा में नहीं रहते लेकिन जीवन स्तर और जो शौक है, उससे कूलर या एसी की खुदरा दूकान जरुर खुल जाएगी. ऐसे में मैं लेखकों के एसी में रहने या न रहने के बजाय विलासिता के प्रतीक को बदलने की अपील जरुर करुंगा. बहरहाल, हिन्दी लेखकों की बातें हिन्दी खित्ते के अनुभवी और कालजयी लोग आगे ज्यादा बेहतर करेंगे.यहां टीवी मीडियाकर्मियों के संदर्भ में एसी के इस मुहावरे को स्पष्ट करना जरुरी समझता हूं.

राजीव प्रताप रुढ़ी जैसे नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और दूसरी बिरादरी से कोसनेवालों की भरमार है जो कुछ नहीं तो टीवी मीडियाकर्मियों को एसी में रहकर बहस करने का मुद्दा बनाकर जमकर कोसते हैं. ये सही है कि पहले के मुकाबले फील्ड की रिपोर्टिंग तेजी से घटी है और आगे ये सिलसिला इस हद तक जारी रहेगा कि ओबी बैन चैनल अफनी नई बनी दैत्याकार बिल्डिंगों में सजाकर रखेंगे. एक हिस्सा म्यूजियम करार देकर उसकी शोभा बढ़ाएंगे या फिर इन ओबी बैन में चाउमिन के काउंटर खुल जाएंगे. लेकिन खासकर टीवी मीडियाकर्मियों के संदर्भ में एसी को लेकर जब बात की जाती है और देश की जनता के आगे उन्हें बहुत ही सुविधाभोगी करार देने की कोशिशें होती है तो मुझे हां में हां मिलाने के पहले अपने उन दिनों की याद आती है जब हम मई-जून की गर्मी में भी घर से शाल-स्वेटर लेकर ऑफिस जाया करते थे.

हम ट्रेनी जिनकी मामूली सैलरी हुआ करती थी और इन्टर्नशिप के दौरान तो अठन्नी भी नहीं, हम तब भी 12 से 14 घंटे उसी एसी में काम करते थे, पटेलनगर के कमरे में वापस आकर सोने पर लगता हम उबले अंडे हो गए हैं. जिन्हें राजीव प्रताप रुढ़ी और हिन्दी सेमिनारों में "ललित निंबध" बांचनेवाले लोग विलासिता का प्रतीक बताकर पूंजीवाद और उसकी गोद में गिरनेवाले लोगों के लिए मानक तैयार करते आए हैं. मेरी तरह मेरी कई दोस्त, सहकर्मी रात के डेढ़-दो बजते ही कंपकपाने लगती थी. यार आज स्वेटर लाना भूल गई, बहुत ठंड लग रही है. आप इसे चैनल का पागलपन कह सकते हैं, ऐसे दर्जनों सर्विस/फ्लोर ब्ऑय मिलेंगे. मीडिया संस्थान के भीतर बिजली की बर्बादी या कुप्रबंधन लेकिन भीतर काम करनेवाले कई ऐसे लोग तब मौजूद होते हैं, जब वो मई-जून की गर्मी में चाहते हैं किसी तरह एक कप चाय या कॉफी मिल जाए. जो लोग डेस्क पर या न्यूजरुम में काम करते हैं, उनके लिए तो फिर भी विकल्प है कि किसी तरह वहां के पंखे, एसी अपने अनुकूल कर लें लेकिन जो सीधे-सीधे न्यूजरुम की मशीनरी सिस्टम के भीतर घुसा है, जहां लाखों के उपकरण रखे हैं, जो एसी के न चलने की स्थिति में गड़बड़ा सकते हैं, गौर करेंगे तो संस्थान ने वहां काम करनेवाले लोगों के लिए नहीं, सिस्टम ठीक-ठाक रहे, उनके लिए इस एसी की व्यवस्था की है जहां मीडियाकर्मियों की मजबूरी है कि वो भीषण गर्मी में भी स्वेटर और कंबल ओढ़कर ही सही लेकिन एसी के बीच ही रहें.

कहने को तो आप इसे बिडंबना कह सकते हैं कि जिस दिल्ली-नोएडा सिटी में लाखों लोगों को पंखे की हवा तक मय्यसर नहीं है, काम करनेवालों का एक वर्ग ऐसा भी है जो एसी की ठंड से बचने के लिए शाल और स्वेटर का इस्तेमाल कर रहा है. लेकिन इस दूसरे तरह की मजबूरी पर भी गौर करने और मुहावरे के बदलने की जरुरत है. जरुरत न भी हो तो टेक्नीकली टीवी मीडियाकर्मियों को एसी के साथ जोड़कर विलासी करार देना गलता है. अव्वल तो ये कि जो एसी में काम कर रहे होते हैं, कईयों की हैसियत इतनी भी नहीं होती कि घर में भी एसी लगाएं, कूलर तक भी नहीं.( खासकर इन्टर्न और ट्रेनी) ऐसे में अर्णव और नविका कुमार जो की बाकादा सूटलेन्थ में मौजूद थे, पर तो फिर भी ये फिकरा कस सकते हैं लेकिन जब पूरा माहौल सौ साल के हिन्दी सिनेमा का है तो ये मुहावरा भी सिनेमेटोग्राफी के लिहाज से गलत हो जाता है और इस पर राजीव प्रताप रुढ़ी जैसा खेलने की नाकाम कोशिश नहीं बल्कि उस वर्ग के लोगों पर कोई कायदे की स्टोरी करने की है जो दस से बारह घंटे तो एसी में होता है लेकिन घर जाने पर पंखे तक की हवा नसीब नहीं होती.



| | edit post
रात के अंधेरे में भी हमें दिल्ली का विकास दिखे इसके लिए पूरे शहर में निऑन वल्ब की कीऑस्क से पूरे शहर को पाट दिया गया है. आप जब देर रात शहर से गुजरेंगे तो संभव है इन किऑस्क के आसपास हाथ को हाथ न सूझे लेकिन "यहां विकास दिखता है" के साईनबोर्ड दूधिया रोशनी में नहा रहे होंगे. एक तरह तीन बड़े-बड़े निऑन वल्ब लगे होते हैं और चारों तरफ जोड़ लें तो कुल बारह वल्ब जिससे कि सीलमपुर,तुर्कमान गेट की उन तंग गलियों में जहां हवा भी नहीं घुस पाती, कम से कम डेढ़ से दो दर्जन पंखे चल जाएंगे. कुछ जगहों पर इन किऑस्क के अलावे ग्राउंडबेस पर पूरी सेटअप लगायी गयी है जिनमें कम से कम दो दर्जन ट्यूब लाइट होंगी. अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस एक सेटअप से कम से कम दो दर्जन घरों में पंखे चल सकते हैं, उतनी बिजली में एक मात्र किऑस्क और सेटअप को रोशनी से नहलाया जा रहा है ताकि मतदाताओं को यकीन हो सके कि दिल्ली में विकास दिख रहा है. इन होर्डिंग से गुजरेंगे तो आपको अजीबोंगरीब नजारे देखने को मिलेंगे..या तो विकास देखने के लिए आपको अपनी आंखें फोड़ने की हद तक नजर दौड़ानी होगी या फिर ऐसा भी समय आएगा कि इतनी मशक्कत के वाबजूद अगर आपको दिल्ली में विकास नहीं दिखता है तो सरकार आपकी आंखें फोड़ देगी.

इन किऑस्क में ये बताया गया है कि सरकार ने अस्पतालों में पहले कितने बिस्तर थे और अब कई गुणा बढ़ाकर कितने अधिक कर दिए ? इसी तरह स्वास्थ्य और दूसरी सुविधाओं को लेकर है. अब आप हॉस्पीटल-दर-हॉस्पीटल बेड गिनने तो जाएंगे नहीं. दो ही काम करेंगे या तो यकीन कर लेंगे या फिर अस्पताल में पहले के मुकाबले कम मारामारी की बात जानकर संतोष करेंगे कि हां कुछ तो बेहतर हुआ है. लेकिन ये दोनों काम न भी करें तो सिर्फ उन इलाकों से गुजरिए जहां-जहां ये भारी भरकम किऑस्क लगाए गए हैं. आपको गंदगी, कूड़े का अंबार दिखेगा. इतनी बदबू कि आप अगर पांच मिनट खड़े हो जाएं तो मितली आ जाएगी. लेकिन गुलाबी-ब्लू रंग की युगलबंदी जो कि हिन्दी सिनेमा "दिल तो पागल है" की याद दिलाता है के बोर्ड चमचमाते मिलेंगे. दिन में कचरों के अंबार के बीच ये बोर्ड ठीक वैसे ही दिखाई देते हैं जैसे देश की करोड़ों लाचार, दाने-दाने को तरसती जनता के बीच अंबानी की मुंबई की बिल्डिंग और दर्प में दमकता चेहरा. रात में ये गंदगी नहीं दिखेगी लेकि अगर अंधेरे को ही िइसकी जगह रखकर देखें तो होर्डिंग के आसपास आपको वो अंधेरा दिखेगा कि थोड़ी सी सावधानी नहीं बरती गई तो दुर्घटना तक हो सकती है.


इन नजारों को देखकर आपके मन में सवाल उठेगा कि क्या दिल्ली सरकार को इस बात की थोड़ी भी समझ नहीं है कि शहर की जनता सिर्फ होर्डिंग देखने की ही नहीं, उस गंदगी, अंधेरे और भारी कुव्यवस्था को देखने का माद्दा रखती है. एक बात, दूसरी बात कि गंदगी से गुजरने पर क्या ये महसूस करना मुश्किल है कि सरकार का कामकाज किस तरीके से चल रहा है. हां,यहां पर जरुर है कि इस फैली गंदगी के लिए एक हद तक जनता को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है लेकिन मैं खुद कई बार केले, ब्रेड के छिलके-पैकेट हाथ में लिए आधे-आधे किलोमीटर तक पैदल चलता हूं लेकिन कहीं कोई कूडेदान दिखाई नहीं देता. अधिकांश को तो जाड़े के दिनों में कूड़ा जमाकर जलाने की प्रथा के तरह प्लास्टिक के कूड़ेदान तक को स्वाहा कर दिया जाता है और बाकी कूडेदान में एकाध बार बम फटने की घटना क्या हो गई, कूड़ेदान को ही या तो उलट दिया गया या फिर इसे धीरे-धीरे गायब कर दिया गया. लेकिन कूड़े डम्प करने के विकल्प हम राह चलती जनता को नहीं दिए गए.

ब्रांड,उत्पाद और कंपनियां इन दैत्यों के आकार की होर्डिंग और किऑस्क लगाती है तो बात समझ आती है कि वो ग्राहक के पूरे सपने को अकेले अपने इस उत्पाद से निगलना चाहती है लेकिन सरकार भी इस तरह के आक्रामक विज्ञापन में बेशर्मी से उतरकर क्या साबित करना चाहती है ? जितनी मेगावाट बिजली की खपत इन किऑस्क को दूधिया रोशनी में नहलाने के लिए खर्च किए जाते हैं, उतनी बिजली से अंधेरी गलियों या सामुदायिक संस्थानों में बिजली मुहैया कराने में लगाए जाएं तो सरकार का ये काम क्या जनता को दिखाई नहीं देगा ? ठीक है कि राजनीतिक विज्ञापन के दौर में राजनीतिक पार्टियां और स्वयं मौजूदा सरकार भी ब्रांड की तर्ज पर ही काम करती है लेकिन ब्रांड भी इस हद तक बेशर्मी नहीं करते. आपने सुना है कि जिन शैम्पू ने इस तरह के दैत्याकार होर्डिंग लगाए, उन शैम्पू के इस्तेमाल से अचानक से बाल झड़ने शुरु हो गए, डैन्ड्रफ पहले से कई गुना बढ़ गए, बाल पकने लगे. ऐसी कम्पनियां अपने आत्मविश्वास को पहले के मुकाबले और विस्तार देने के लिए विज्ञापन करती है और उनके पास पहले से कुछ तर्क और परिणाम मौजूद होते हैं न कि सरकार की तरह खोए हुए आत्मविश्वास और नाकामी पर पर्दा डालने के लिए विज्ञापन को हथकंड़े के रुप में इस्तेमाल करने के लिए.

अच्छा, विज्ञापन आप उस बात के लिए करो न, जो कि सचमुच तर्कसंगत हो. आपने होर्डिंग लगायी है कि पहले इतने हजार ही बेड थे, अब बढ़ाकर इतने हजार हो गए. इस होर्डिंग के नीचे जो नरक है, कचरे का अंबार है और उन पर दर्जनों घातक मच्छर,मक्खी पनप रहे हैं क्या बिस्तर की संख्या इसलिए बढ़ायी है कि हम इन होर्डिंग्स को यहां रुककर गौर से देखें और सीधे उन बिस्तरों का लाभ उठाएं ? सरकार इतनी बेशर्म हो भी जाए तो भी जनता को बेसिक चीजों की समझ है जिसे कि राजनीतिक विज्ञापन बनानेवाली और पीआर एजेंसियों के जरिए अपनी छवि चमकानेवाली सरकार और राजनीतिक पार्टियां समझ ही नहीं पा रही हैं. उन्हें इस बात का रत्तीभर भी यकीन नहीं है कि जो सरकार अपनी ही लगायी होर्डिंग्स के आसपास साफ-सफाई का ध्यान नहीं रख पा रही है, वो भला बिस्तर ही बढ़ाकर कौन सा तीर मार लिया होगा या फिर उन बिस्तरों के पीछे का सच  क्या होगा, समझ आता है. करिश्माई तेल,मलहम की बात तो छोड़िए लेकिन कायदे के किसी भी उत्पाद,कंपनी और ब्रांड के विज्ञापन न तो हवा में जारी किए जाते हैं और न हवाई किले की तरह उनके दावे होते हैं. वो अपने ग्राहकों की बौद्धिक क्षमता पर भरपूर यकीन करते हैं और तब उस हिसाब से विज्ञापन जारी करते हैं. सरकार अगर समाज के सच को नहीं भी समझना चाहे तो बेहतर हो कि विज्ञापन के मूलभूत सिद्धांत और तर्क को समझे. नहीं तो ऐसे विज्ञापन तमाशे के साथ-साथ गहरे रुप से नकारात्मक असर करते हैं.
| | edit post